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न्यूरॉन को कंप्यूटर से कैसे जोड़ा गया?

The Outlook  में एक बार फिर आपका स्वागत है। आज की चर्चा में जानिए कि-  न्यूरॉन को कंप्यूटर से कैसे जोड़ा गया? What is neuron? मस्तिष्क में ए...

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The Outlook में एक बार फिर आपका स्वागत है। आज की चर्चा में जानिए कि- न्यूरॉन को कंप्यूटर से कैसे जोड़ा गया?

What is neuron?

मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार की कोशिका है जो दूसरे न्यूरॉन से संकेत प्राप्त करती है और जरूरत पड़ने पर स्वयं विद्युत संकेत भेजती है। हमारे मस्तिष्क में लगभग 86 अरब न्यूरॉन (Neuron) होते हैं। अकेला Neuron बहुत साधारण ढंग से काम करता है, लेकिन जब अरबों Neuron आपस में जुड़ते हैं और लगातार एक-दूसरे को संकेत भेजते हैं, तो अत्यंत जटिल Network बन जाता है। यही नेटवर्क हमें देखने, सुनने, चलने, बोलने, याद रखने और निर्णय लेने जैसी क्षमताएं देता है।

न्यूरॉन के बीच बने संबंध स्थायी नहीं होते। अनुभव के अनुसार ये संबंध मजबूत या कमजोर हो सकते हैं। इसी क्षमता को Neural plasticity, यानी तंत्रिका-लचीलापन, कहा जाता है। सरल भाषा में कहें तो आपका मस्तिष्क ऐसी मशीन है जो अपने अनुभव के साथ अपनी आंतरिक वायरिंग को बदल सकती है।

न्यूरॉन को कंप्यूटर से कैसे जोड़ा गया?

इसके लिए वैज्ञानिकों ने एक मल्टी-इलेक्ट्रोड एरे का इस्तेमाल किया। यह ऐसी सतह है जिस पर बड़ी संख्या में बेहद छोटे इलेक्ट्रोड लगे होते हैं। ये इलेक्ट्रोड न्यूरॉन की विद्युत गतिविधि को पढ़ सकते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें विद्युत संकेत भी दे सकते हैं। इस व्यवस्था ने कंप्यूटर और जीवित न्यूरॉन के बीच दो तरफा संवाद स्थापित कर दिया। कंप्यूटर ने न्यूरॉन को संकेत दिए और न्यूरॉन की गतिविधि को वापस कंप्यूटर ने पढ़ा। यानी व्यवस्था कुछ ऐसी थी: कंप्यूटर से संकेत → न्यूरॉन की प्रतिक्रिया → कंप्यूटर द्वारा प्रतिक्रिया को पढ़ना → फिर नया संकेत।

यही बात इस प्रयोग की असली कुंजी है। यदि वैज्ञानिक केवल न्यूरॉन की गतिविधि रिकॉर्ड करते, तो यह सामान्य न्यूरोसाइंस प्रयोग होता। लेकिन यहां न्यूरॉन को ऐसे वातावरण में रखा गया जिसमें उसकी गतिविधि का परिणाम तुरंत वापस उसके सामने आ रहा था।

‘पोंग’ ही क्यों?

‘पोंग’ 1970 के दशक का बेहद सरल वीडियो गेम है। इसमें स्क्रीन पर एक गेंद चलती है और खिलाड़ी को एक छोटी पट्टी को ऊपर-नीचे करके गेंद को वापस मारना होता है। इस खेल की सरलता वैज्ञानिकों के लिए उपयोगी थी क्योंकि उन्हें न्यूरॉन नेटवर्क के सामने किसी जटिल समस्या को रखने की जरूरत नहीं थी। बस एक छोटा-सा संबंध सीखना था कि गेंद किस दिशा में जा रही है और पट्टी को किस दिशा में ले जाना है।

वैज्ञानिकों ने गेंद की स्थिति को सीधे न्यूरॉन के सामने नहीं रखा। उन्होंने उसकी स्थिति को विद्युत संकेतों में बदल दिया। जब गेंद किसी विशेष दिशा में थी, तो न्यूरल नेटवर्क के अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह की विद्युत उत्तेजना दी जाती थी। इस तरह कंप्यूटर की स्क्रीन पर दिखाई देने वाली सूचना न्यूरॉन के लिए विद्युत संकेतों की भाषा में बदल गई।

फिर न्यूरॉन ने सीखा कैसे?

यहीं प्रयोग का सबसे दिलचस्प हिस्सा आता है। वैज्ञानिकों ने न्यूरॉन को यह निर्देश नहीं दिया कि अब ऊपर जाओ या अब नीचे जाओ। उन्होंने उसे परिणाम के आधार पर प्रतिक्रिया बदलने का अवसर दिया। यदि गेंद वापस मारने की स्थिति बेहतर हुई तो नेटवर्क को अपेक्षाकृत व्यवस्थित और पूर्वानुमेय संकेत मिले। यदि गेंद छूट गई तो उसे अधिक अव्यवस्थित संकेत मिले। धीरे-धीरे न्यूरल नेटवर्क की गतिविधि में बदलाव दिखाई देने लगा और उसकी खेल-क्षमता सुधरने लगी। शोधकर्ताओं ने लगभग पांच मिनट के भीतर सीखने के संकेत देखे, जबकि उचित प्रतिक्रिया के बिना नियंत्रण प्रयोगों में वैसा सुधार नहीं दिखाई दिया।

इसे किसी बच्चे के उदाहरण से समझिए। बच्चा आग को छूता है, हाथ में गर्मी महसूस करता है और अगली बार हाथ पीछे खींच लेता है। किसी ने उसके मस्तिष्क में आग गर्म होती है नाम का कोई वाक्य नहीं डाला। अनुभव ने उसके व्यवहार को बदल दिया। न्यूरॉन नेटवर्क में भी कुछ इसी प्रकार का मूलभूत सिद्धांत काम कर सकता है: अनुभव, प्रतिक्रिया और फिर गतिविधि में बदलाव।

सीखना और चेतना एक ही चीज नहीं हैं। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। किसी प्रणाली का सीखना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह सचेत भी है। एक साधारण मशीन भी तापमान के अनुसार अपना व्यवहार बदल सकती है। आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी अपने प्रशिक्षण के दौरान अपने गणितीय मापदंड बदलती है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि मशीन मनुष्य की तरह कुछ अनुभव करती है।

अब आता है ब्रेन ऑर्गेनॉइड।

‘डिशब्रेन’ जैसे प्रयोगों के साथ-साथ वैज्ञानिक ब्रेन ऑर्गेनॉइड पर भी काम कर रहे हैं। ऑर्गेनॉइड को सरल भाषा में प्रयोगशाला में विकसित छोटा-सा त्रि-आयामी जैविक ऊतक कहा जा सकता है। वैज्ञानिक स्टेम सेल जैसी कोशिकाओं को विशेष परिस्थितियों में विकसित करते हैं और उनसे न्यूरॉन सहित कुछ ऐसी संरचनाएं बन सकती हैं जिनमें विकासशील मस्तिष्क की कुछ विशेषताएं दिखाई देती हैं।

लेकिन ऑर्गेनॉइड को छोटा मानव-मस्तिष्क समझना गलत होगा। उसमें सामान्य मानव मस्तिष्क जैसी पूर्ण संरचना, रक्त-संचार व्यवस्था, शरीर से प्राकृतिक संबंध और जटिल मस्तिष्क क्षेत्रों की पूरी व्यवस्था नहीं होती। फिर भी उसमें वास्तविक जीवित न्यूरॉन और उनके बीच वास्तविक जैविक संबंध होते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस की अवधारणा विकसित करनी शुरू की है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि क्या ऐसे जीवित न्यूरल ऊतक को सूचना के प्रसंस्करण और सीखने के अध्ययन में इस्तेमाल किया जा सकता है।

2023 में ‘नेचर इलेक्ट्रॉनिक्स’ में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ब्रेनोवेयर नामक प्रणाली प्रस्तुत की। इसमें एक त्रि-आयामी ब्रेन ऑर्गेनॉइड को उच्च घनत्व वाले इलेक्ट्रोड से जोड़ा गया। इलेक्ट्रोड के जरिए ऑर्गेनॉइड को विद्युत संकेत दिए गए और उसकी प्रतिक्रिया को रिकॉर्ड किया गया।

इस प्रणाली में रिजर्वायर कंप्यूटिंग की अवधारणा का इस्तेमाल किया गया। इसे समझना आसान है। मान लीजिए आपके सामने पानी से भरा एक कटोरा है। आप उसमें एक बूंद स्याही डालते हैं। स्याही पानी में फैलती है और कुछ समय तक पानी के भीतर अलग-अलग पैटर्न बनाती रहती है। यदि आप उस बदलते हुए पैटर्न को ध्यान से पढ़ सकें तो आपको शुरुआती संकेत के बारे में जानकारी मिल सकती है।

रिजर्वायर कंप्यूटिंग में न्यूरल नेटवर्क कुछ इसी तरह काम करता है। इनपुट उसके भीतर जाता है, नेटवर्क में गतिविधि फैलती और बदलती है और फिर उस बदलती हुई गतिविधि से आउटपुट निकाला जाता है। ब्रेनोवेयर में इसका इस्तेमाल भाषण पहचान और कुछ गणितीय पूर्वानुमान संबंधी कार्यों पर किया गया। इसका मतलब यह नहीं है कि ऑर्गेनॉइड ने इंसान की तरह भाषा समझ ली। इसका अर्थ इतना है कि जीवित न्यूरल ऊतक की जटिल विद्युत गतिविधि को सूचना प्रसंस्करण के लिए उपयोग किया जा सकता है।

फिर सिलिकॉन की जरूरत क्यों?

यह सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक सवाल है। हमारे पास आज अत्यंत शक्तिशाली ग्राफिक्स प्रोसेसर और दूसरे विशेष कंप्यूटिंग चिप हैं। फिर वैज्ञानिक जीवित कोशिकाओं से कंप्यूटर बनाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं?

इसका एक कारण ऊर्जा दक्षता है। मानव मस्तिष्क लगभग 20 वाट के आसपास ऊर्जा में काम करता है, जबकि बड़े आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम के प्रशिक्षण और संचालन के लिए बहुत अधिक ऊर्जा और विशाल डेटा-सेंटर की जरूरत पड़ सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई छोटा ब्रेन ऑर्गेनॉइड आज के आधुनिक कंप्यूटर से ज्यादा शक्तिशाली है। वह अभी बहुत सीमित, नाजुक और प्रयोगात्मक अवस्था में है।

संभावित लाभ कहीं और है। जीवित Neuron अपने बीच के संबंध बदल सकते हैं और बदलते वातावरण के अनुसार अनुकूलित हो सकते हैं। इसलिए वैज्ञानिक यह देख रहे हैं कि क्या भविष्य में जैविक नेटवर्क कुछ विशेष प्रकार की समस्याओं को कम ऊर्जा और कम प्रशिक्षण उदाहरणों के साथ हल कर सकते हैं।

लेकिन दिलचस्प बात तो ये है कि इसका असली उपयोग शायद कंप्यूटर नहीं, चिकित्सा हो। ब्रेन ऑर्गेनॉइड की सबसे उपयोगी भूमिक जैविक कंप्यूटर बनना नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क का मॉडल बनना है।

मान लीजिए किसी व्यक्ति को मस्तिष्क से संबंधित कोई बीमारी है। उसके मस्तिष्क के भीतर चल रही जैविक प्रक्रिया को किसी सामान्य कंप्यूटर में हूबहू दोहराना कठिन है। लेकिन यदि उस व्यक्ति की कोशिकाओं से प्रयोगशाला में न्यूरल ऑर्गेनॉइड बनाया जा सके, तो वैज्ञानिक उसमें बीमारी से जुड़ी कुछ प्रक्रियाओं का अध्ययन कर सकते हैं और संभावित दवाओं की जांच कर सकते हैं।

यही कारण है कि Brain Organoid का इस्तेमाल मस्तिष्क के विकास, तंत्रिका संबंधी रोगों और दवाओं के संभावित प्रभावों को समझने के लिए किया जा रहा है। भविष्य में रोगी-विशिष्ट ऑर्गेनॉइड व्यक्तिगत चिकित्सा के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं।

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