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तिब्बत में Bardo Thodol  नाम का एक कर्मकांड होता है। इसमें मरणासन्न व्यक्ति को उसकी मृत्यु तक और मरने के कुछ दिनों बाद तक लामा द्वारा कुछ सु...

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तिब्बत में Bardo Thodol नाम का एक कर्मकांड होता है। इसमें मरणासन्न व्यक्ति को उसकी मृत्यु तक और मरने के कुछ दिनों बाद तक लामा द्वारा कुछ सुझाव दिए जाते हैं।

लामा रोज़ उस व्यक्ति के पास आता है, उसके सामने किसी पोथी का पाठ करता है, घर परिवार और मोहल्ले के लोग भी सुनते हैं। लामा उस मरने वाले को समझाता है कि अब तेरी मृत्यु नज़दीक है, शरीर छूटने वाला है, होश रखना, सबको माफ़ कर दे, सब से माफ़ी माँग ले, कोई बोझ मन पर हो तो उतार दे, इत्यादि-इत्यादि।

The-Tibetan-Book-of-the-Dead
ये सब The Tibetan Book of the Dead👉में विस्तार से लिखा है। यूट्यूब पर इसके ऊपर बनी डाक्यूमेंट्री भी मिल जाएगी, आप आसानी से देख सकते हैं।

कार्ल जंग स्विट्ज़रलैंड के बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक हुए हैं। सिगमंड फ़्रायड के बाद उनका नाम बहुत प्रसिद्ध है। जंग के मनोविज्ञान की वास्तविक खोज तिब्बत से शुरू हुई थी। कार्ल जंग के मनोविज्ञान पर The Tibetan Book of the Dead का गहरा प्रभाव है। फ़्रायड और जंग दोनों ने सपनों पर बहुत काम किया है।

फ़्रायड ने इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन के बाद यूरोप में हुए शहरीकरण और उसकी असुरक्षाओं के मद्देनज़र सेक्स और दमन को केंद्र में रखकर सपनों में झाँकना शुरू किया। फ़्रायड को प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका ने भीतर से हिला दिया था।

वह एक यहूदी थे। नाज़ी जर्मनी में उनके कई मित्र, रिश्तेदार और परिवार के सदस्य नाज़ी अत्याचार में मारे गए। इन सबके बीच उन्होंने देखा कि कैसे शहरीकरण, पूँजीवाद (Capitalism) और युद्ध ने मनुष्य के भीतर गहरी असुरक्षाएँ और दमन पैदा कर दिए हैं।

इन्हीं तजुर्बों के आधार पर उन्होंने सेक्स और दमन के क्रूर, छिपे हुए चेहरे को उजागर करना शुरू किया। यानी वह सब जो मुस्कुराते हुए चेहरों और सभ्यता के पर्दे के नीचे दबा था, और जिसे वे “अवचेतन” कहते थे।

कई लोग मानते हैं कि फ़्रायड ने मन और चेतना को दमित सेक्स से जोड़कर उसे अनकांशस के दलदल में घसीट कर पाशविक बना दिया। फ़्रायड के मनोविज्ञान में मन की पैथोलॉजी और मनोरोग विज्ञान ही सब कुछ है। वहाँ चेतना के ऊँचे आयामों और सृजन, कला, निर्विचार, समाधि तथा व्यक्तित्व के ऊँचे स्तरों के विषय में रुचि और जानकारी कम मिलती है।

लेकिन कार्ल जंग ने दूसरा रास्ता पकड़ा। उन्होंने कहा कि जीवन में जो कुछ है, वो सब कुछ दमित सेक्स का दलदल मात्र नहीं है। उनके अनुसार सामूहिक अवचेतन और सामूहिक हित के लिए सृजन एक बड़ी शक्ति है।

फ़्रायड एक तरफ़ व्यक्ति के सेक्स (सृजन) और व्यक्ति के अवचेतन को सबसे बड़ी शक्ति बताते हैं, वहीं कार्ल जंग सामूहिक अवचेतन और सामूहिक सृजन को सबसे बड़ी शक्ति बताते हैं।

अब आइए The Tibetan Book of the Dead पर फिर से लौटें।

यह किताब भगवान पद्मसंभव ने लिखी है, जो भारत के वज्रयान को लेकर तिब्बत गए। वहाँ इस किताब के आधार पर पूरी सभ्यता खड़ी हुई। दलाई लामा और अन्य संस्थाएँ इसी से निकली हैं। यह परंपरा ध्यान, समाधि और सपनों के अर्थों पर बहुत ज़ोर देती है। इसी परंपरा में काल, महाकाल, मंडल, यंत्र, मुद्रा, चक्र, कुंडलिनी, बन्ध, प्राणायाम, आसान, हठयोग, लय योग, भक्तियोग आदि का विज्ञान जन्मा। इसका निर्माण तक्षशिला, नालंदा, ओदंतपुरी, विक्रमशिला आदि के विश्वविद्यालयों में हुआ। यही आजकल पूरे भारत में पिछले एक हज़ार साल से फैला हुआ है। ये शुद्धतम वज्रयान है जिसका पालन करने वालों को ग्रीस, अरब और पर्शिया के लोगों ने "इंडोस", "अल-हिन्द" और फिर "हिंदू" नाम दे दिया है।

अब आइए वज्रयान द्वारा रचे गए मिथकों पर।

वज्रयान से भी काफ़ी पहले थेरवाद और महायान ने बुद्ध की माता के स्वप्नों का उल्लेख किया है। ऐसी ही परंपरा जैन धर्म में भी है। वहाँ भी तीर्थंकरों की माताओं के स्वप्नों का ज़िक्र है।

भारतीय भौतिकवादी धर्मों की ख़ासियत है कि वो शरीर-विज्ञान और मनोविज्ञान में बहुत गहराई तक झाँकते हैं। ये व्रात्य धर्म हैं, जो व्रत, संकल्प और अनुशासन पर आधारित हैं। यज्ञ पर आधारित धर्म याज्ञ कहलाते हैं, इनमें याचना, प्रार्थना और स्तुति मुख्य सिद्धांत हैं।

इसी से आप समझ सकते हैं कि योग और तंत्र के जनक व्रात्य धर्म के लोग थे। प्रार्थना और याचना करने वाला भला योग, आसान, प्राणायाम क्यों करेगा?

पश्चिम के ईश्वरवादी धर्मों को देखिए उनमें सिर्फ़ प्रार्थना है, वे योग तंत्र कुंडलिनी आदि नहीं करते। प्रार्थना और यज्ञ वाले लोग तो जीवन का आनंद और जीवन से मुक्ति दोनों ईश्वर से माँगेगा, वे लोग बड़े-बड़े यज्ञों, बलियों, लंबे सार्वजनिक कर्मकांडों और स्तुतियों का निर्माण करेंगे। लेकिन जीवन का आनंद और जीवन से मुक्ति जिन्हें अपनी मेहनत से हासिल करनी है वे लोग योग, तप, नाड़ी शोधन, शरीर शोधन, उपोषण, कायाक्लेश, अणु व्रत, महावृत कायोत्सर्ग और हज़ारों तरह के तंत्र का निर्माण करेंगे। ये बात बिलकुल सीधी और साफ़ है।

अब वज्रयान द्वारा भारत के घर-घर में पहुँचा दिए गए दीवाली के प्रतीक पर आइए। कथा यह है कि बुद्ध की माता को स्वप्न आता है कि उनके गर्भ में सफ़ेद हाथी का प्रवेश हुआ है। कार्ल जंग के अनुसार, सफेद हाथी जैसे प्रतीक “दिव्य चेतना” या “आंतरिक विकास” को दर्शाते हैं। ये किसी इंसान के भीतर ख़ुद की या गर्भ में पल रही चेतना के विकास या उच्च अवस्था की जानकारी देते हैं।

सिगमंड फ़्रायड और जंग दोनों के अनुसार, गर्भधारण के बाद लगभग तीन महीने में गर्भस्थ जीवन में पहली भौतिक हलचल शुरू होती है। तब माँ को अपने गर्भ में पल रहे नए जीवन और उसकी चेतना के बारे में सपने आने शुरू होते हैं।

फ़्रायड इसे “मैटरनल एक्सेप्टेंस” और “लाइफ़ क्रिएशन” की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति मानते हैं।

कार्ल जंग बताते हैं कि गर्भवती स्त्री को आने वाले सपनों के प्रतीक - जैसे पशु, अंडा, कमल, गर्भ, नदी- गर्भस्थ चेतना के विकास और रूपांतरण का संकेत हैं। जंग की शब्दावली में बुद्ध की माता द्वारा देखे गए सपनों में हाथी या सफेद पशु को “आर्केटाइप ऑफ़ डिवाइन एनर्जी” कहा गया है। “द आर्केटाइप्स ऐंड द कलेक्टिव अनकॉन्शस”, “फ़ोर आर्केटाइप्स: मदर, रीबर्थ, स्पिरिट, ट्रिकस्टर” और “कन्सर्निंग रीबर्थ”जैसी रचनाओं में जंग “मेटरनिटी आर्केटाइप” और “बर्थ ऑफ़ सेल्फ़” जैसे विषयों पर लिखते हैं कि गर्भावस्था के सपने नये जीवन के भीतर नई चेतना के जन्म का प्रतीक होते हैं।

बौद्ध ग्रंथों में कथा है कि बुद्ध की माता को स्वप्न आया कि कोई सफ़ेद हाथी उनके गर्भ में प्रवेश कर रहा है। सभी बौद्ध ग्रंथों में संकेत है कि यह स्वप्न गर्भधारण की रात को आया। लेकिन फ़्रायड और जंग के मनोविज्ञान के अनुसार ऐसे स्वप्न अक्सर गर्भधारण के तीन महीने बाद आते हैं। धर्मग्रंथों की लेखन-शैली प्रतीकात्मक और अतिशयोक्तिपूर्ण होती है, इसलिए वे कहते हैं कि यह स्वप्न गर्भाधान की रात में, शयन या मिलन से पहले या बाद में आया। मान लीजिए कि कार्तिक अमावस्या की रात्रि में - या इस सप्ताह में- बुद्ध की माता को सफ़ेद हाथी का स्वप्न आता है।

इसका अर्थ हुआ कि कार्तिक माह तक आते-आते बुद्ध की माता को गर्भधारण के तीन महीने पूरे हो चुके हैं। अब आप बुद्ध के जन्म के समय पर ध्यान दीजिए। वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध का जन्म बताया जाता है। कार्तिक अमावस्या से वैशाख पूर्णिमा तक लगभग छह महीने का अंतराल है।

इसका क्या अर्थ हुआ, आप ख़ुद सोचिए।

इसका सीधा संबंध महायान और वज्रयान से बनता है। दीवाली पर भारत के हर घर में बुद्ध और बुद्ध की माता का ही पूजन होता है। ये बहुत सीधी बात है, कहीं कोई कन्फ्यूजन नहीं है। भरहुत स्तूप और सांची स्तूप में गजलक्ष्मी देवी की ठीक वही तस्वीर है जिसकी लक्ष्मीपूजन के समय पूजा होती है।

गज यानी हाथी, वास्तव में सफेद हाथी महामाया (बुद्ध की माता) के गर्भ में बुद्ध चेतना के प्रवेश का प्रतीक है। यही बुद्ध वैषाख पूर्णिमा को जन्म लेते हैं। कार्तिक अमावस्या से वैषाख पूर्णिमा के समय के अंतराल पर ध्यान दीजिए।

ये बुद्ध वही विनायक हैं जिन्होंने अष्ट विनय (अष्टांग मार्ग) दिया है। यही शिशु-बुद्ध एलिफेंट बुद्धा बन जाते हैं और गजलक्ष्मी देवी भी बदलकर धनलक्ष्मी देवी बन जाती हैं।

फिर वज्रयान में अष्ट-विनायक गणेश रूप धारण करते हैं, इस तरह वे पूरे भारत में सबके पूज्य और आराध्य बन जाते हैं।

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